आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के पास स्थित श्रीकालहस्ती नामक जगह पर भगवान शिव का एक विशेष मंदिर है। इसे दक्षिण का कैलाश व काशी कहा जाता है। श्री कालहस्ती मंदिर पेन्नार नदी की शाखा स्वर्णमुखी नदी के तट पर बसा है।
- इस मंदिर को राहू-केतु मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर लोग राहू पूजा व शांति हेतु आते हैं। दक्षिण के पंचतत्व लिंगों में यह वायु तत्त्व लिंग माना जाता है। अतः पूजारी भी उसका स्पर्श नहीं कर सकते। मूर्ति के पास स्वर्ण पट्ट स्थापित है। उसी पर फूल-माला इत्यादि चढ़ाई जाती है। इस मंदिर में पिंडी की ऊंचाई लगभग चार फीट है। पिंडी पर मकड़ी एवं हाथी की आकृति प्रतीत होती है।
सालाना आय 100 करोड़ रुपए से अधिक
मंदिर का शिखर दक्षिण भारतीय शैली में बना हुआ है, जिस पर सफेद रंग का आवरण है। मंदिर में तीन भव्य गोपुरम हैं। इसके साथ ही सौ स्तंभों वाला मंडप है, जो स्थापत्य कला के नजरिये से अद्वितीय है। मंदिर के अंदर कई शिवलिंग स्थापित हैं। भगवान कालहस्तीश्वर व देवी ज्ञानप्रसूनअंबा भी विराजमान हैं। इस कालहस्ती मंदिर की सालाना आय 100 करोड़ रुपए से भी ज्यादा है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर ही अर्जुन ने प्रभु कालहस्ती वर के दर्शन किए थे।
तीनों पशुओं की मूर्तियां स्थापित
मान्यता अनुसार इस स्थान का नाम तीन पशुओं, श्री यानी मकड़ी, काल यानी सर्प तथा हस्ती यानी हाथी के नाम पर रखा गया है। एक जनुश्रुति के अनुसार मकड़ी ने शिवलिंग पर तपस्या करते हुए जाल बनाया था व सांप ने लिंग से लिपटकर आराधना की और हाथी ने शिवलिंग को जल से स्नान करवाया था। यहां पर इन तीनों की मूर्तियां भी स्थापित हैं। श्रीकालहस्ती का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण में भी मिलता है